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दीप पररक्रमा

गोपाल राजू की चर्चित पुस्तक, 'दूर करें दुर्ािग्य' का सार-संक्षेप
मानसश्री गोपाल राजू
30, ससविल लाइन्स
रूड़की - 247 667 (उत्तराखण्ड)
www.bestastrologer4u.blogspot.in
लक्ष्मी की साधना में दीप पररक्रमा का बहुत महत्ि है परन्तु इसका विधान बहुत जटिल है। क्योंकक इसमें सोने, चांदी, कांसे, तााँबे तथा लोहे के दीपक प्रयोग ककए जाते हैं इससलए यह साधना सििसाधारण की सामर्थयि से दूर र्ी है। तथावपि् इन दीपकों के प्रयोग की सरलतम विर्ध पाठकों के सलए सििप्रथम इस लेख के माध्यम से दे रहा हूाँ। दीपािली-होली की रात अथिा अपने बुवि-वििेक से अन्य ककसी शुर् मुहूति में यह प्रयोग करें।
सििप्रथम पांच दीपक ककसी धातु के ऐेसे ले लें जजन पर सोने और चांदी की प्लेटिंग करिाई जा सके । तांबे, लोहे तथा कााँसे के दीपक सहजता से जुिाए जा सकते हैं। यटद इस प्रकार दीपक उपलब्ध न कर पाने की र्ी सामर्थयि न हो तो साधारण दीपकों में कोई सोने, चांदी के आर्ूषण अथिा इनके अंश डालकर मानससक कल्पना से सोने-चांदी के दीपक मानकर अपना प्रयोजन ससि करें। इसी प्रकार कांसे, तांबे तथा लोहे के िुकड़े डालकर आप इन तीन धातुओं के र्ी िैकजल्पक दीपक बना सकते हैं। सोने-चााँदी के दीपकों में आप शुि घी का प्रयोग करें।
तांबे तथा कांसे के दीपकों में ततल का तेल तथा लोहे के दीपक में सरसों का तेल रखें। यटद शुि घी जुिा पाने की क्षमता न हो तो सब दीपकों में ततल का तेल प्रयोग करें। लक्ष्मी साधना के सलए सिोतम बत्ती होती है श्िेताकि की रुई की । यटद यह सुलर् न हो तो लाल रंग के कच्चे सूत की बत्ती ले लें।
लक्ष्मी साधना के सलए आप पूिािसर्मुख होकर बैठ जाएाँ, अपने सामने पांचों दीपक इस क्रम में रखें।
- पूरब की ओर प्रज्जिसलत होता चांदी का दीपक ।
- दक्षक्षण की ओर बत्ती िाला तांबे का दीपक ।
- पजश्चम की ओर बत्ती िाला लोहे का दीपक ।
- उत्तर की ओर जलती बत्ती िाला कांसे का दीपक और
- मध्य में ऊध्िािमुखी बत्ती िाला सोने का दीपक ।
पूरब का दीपक चािलों के आसन पर स्थावपत करें। दक्षक्षण का दीपक मसूर की दाल के आसन पर, पजश्चम िाला दीपक उड़द के आसन पर, उत्तर िाला दीपक चने की दाल पर तथा मध्य में सोने िाला दीपक गेहूाँ के आसन पर स्थावपत करें। एक-एक मुट्ठी पररमाण में उक्त अनाज लेकर उनको आसन का रूप दे सकते हैं।
सििप्रथम आप लक्ष्मी प्रदायक कोई मंत्र अपनी सुविधानुसार ऐसा चुन लें जो तनत्य सरलता से जपा जा सके। इसके अततररक्त आप दुगािसप्तशती में से र्ी कोई मंत्र अपने कायि की ससवि के सलए चुनकर प्रयोग कर सकते हैं।
श्री माकिण्डेय पुराण के अन्तिगत देिीमाहात््य में श्लोक, अधिश्लोक तथा उिाच आटद समलाकर कुल 700 मंत्र हैं। यह महात््य दुगाि सप्तशती के नाम से प्रससि है। सप्तशती अथि, धमि, काम और मोक्ष - चारो पुरूषाथों को प्रदान करने िाली हैं। जजस र्ाि, प्रयोजन
तथा कामना से यह मंत्र जप ककए जाते हैं तद्नुसार ही तनजश्चत फल की प्राजप्त होती है। यहााँ कुछ मंत्र दे रहा हूाँ, अपने बुवि-वििेक से चुनकर लार् उठाएं-
सििमंगल मांगल्ये सशिे स्िाथि सार्धके।
शरण्ये य्बके गौरर नारायणे नमोऽस्तुते।।
या देवि सििर्ूतेषु लक्ष्मीरूपेण सजस्थतााः।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमाः।।
ऊाँ जयन्ती मंर्गलाकाली र्द्रकाली कपासलनी।
दुगाि क्षमा सशिा धात्री स्िाहा स्िधा नमोऽस्तुते।।
शरणागतदीनाति पररत्राण परायणे।
सििस्याततिहरे देवि नारायणण नमोऽस्तुते।।
करोतु सा नाः शुर्हेतुरीश्िरी । शुर्ातन र्द्राण्यसर्हन्तु चापदाः।
देटह सौर्ाग्यमारोग्यं देटह मे परमं सुखमि्।
रूपं देटह जयं देटह यशो देटह द्विषो जटह।।
सिािबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याणखलेश्िरर ।
एिमेि त्िया कायिमस्महैररविनाशनमि्।।
विधेटह देवि कल्याणं विधेटह परमांर्श्रयमि्।
रूपं देटह जयं देटह यशो देटह द्विषो जटह।।
चुने हुए मंत्र की ग्यारह-ग्यारह मालाएं क्रम से पूरब, दक्षक्षण, पजश्चम, उत्तर तथा केन्द्र के प्रज्जिसलत दीपकों पर ध्यान करते हुए जप प्रार्र् करें। प्रत्येक मंत्र के बाद आसन के अनुसार अनाज की एक-एक आहुतत दीपकों के स्मुख हव्य स्िरूप छोड़ते रहें। अन्तताः आपकी कुल आहुततयों की संख्या 5940 होगी।
अनुष्ठान की समाजप्त पर सब अनाज एकत्र करके सुरक्षक्षत रख लें । इन्हें अपने तनत्य प्रयोग होने िाले अन्न में समलाकर स्ियं प्रयोग करें। प्रसाद स्िरूप अन्य को र्ी वितररत करें। जजनसे र्ी आपका कोई प्रयोजन पूरा हो रहा है, उन्हें र्ी इस अनाज का अंश दे सकते हैं। इससे आत्मीयता और परस्पर स्नेह-प्रेम बढ़ेगा ।
तदन्तर में तनत्य इसी मंत्र की एक माला तनत्य जपा ककया करें। सिािथ ससवि के सलए यह उपाय बहुत ही प्रर्ािशाली है । साथ ही साथ चंचला लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी तथा ऋण से मुजक्त के सलए र्ी यह प्रयोग आपके सलए बहुत लार्दायक ससि होगा।
मानसश्री गोपाल राजू

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