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भूत

मानसश्री गोपाल राजू
रूड़की – २४७ ६६७ (उत्तराखंड)
www.bestastrologer4u.blogspot.in
चिककत्सा शास्त्र में शब्द आता है मनोरोग। भारतीय अनेकों पाच्य साहहत्य में सामान्यतः इसको भूत विज्ञान कह हदया जाता है अर्ाात् िह बीमारी जो ऐसे कारणों से हो रही है जो पराजगत् से सम्बन्न्ित हैं। देिी आत्मा, प्रेत बािा, ओपरा, खेलना, झूमना, ऊपरी बािा आहद अनेकों ऐस शब्द हैं जो पराजगत् की बातों से सम्बद्ि हैं। आिुननक विज्ञान और ऐलोपेर्ी चिककत्सा इन बातों में ऊपरी मन से विश्िास नहीं करते परन्तु आयुिेद शास्त्रों में भूत-प्रेत बािा से पीड़ा और उनके उपिारों की वििेिना व्यापक रूप से ममलती है।
िैसे तो भूत-प्रेत नामक ककसी पराशन्तत आहद की बातें जैसे कक उनका प्राकट्य, उनका अन्स्त्तत्ि, उनका ननिास, उनका लोक, उनके द्िारा पहुुँिाई गयी पीड़ा और अनेक
अनुभिों में उनके द्िारा पहुुँिाया गया लाभ आहद का कभी भी कोई एक सुननन्श्ित मत नहीं रहा है। परन्तु ऐसे भी अनेक प्रकरण उदाहरण स्त्िरूप सामने आए हैं कक विश्िास न करने िाला भी अनुभूत होने पर इन पराविज्ञान की बातों और उनके तथ्य पर विश्िास करने लगा है।
अष्ांग आयुिेद में भूत विद्या और ग्रह बािा नाम से स्त्पष् रूप से वििरण ममलता है। सुश्रुत संहहता के 'अमानुषोपसगा प्रनतबेि' अध्याय तर्ा िरक संहहता के 'उन्माद प्रकरण', 'अष्ांग संग्रह' में भूत विज्ञानीय भूत प्रनतबेि, अष्ांहृदय में भूत विज्ञानीय एिं प्रनतबेि भूत विद्या के सम्बि में रोिक सामग्री उपलब्ि हैं। इसके अनतररतत भूताहद ग्रहों एिं बाल ग्रहों के विषय में भी इन ग्रंर्ों में वििरण ममलते हैं। सुश्रुत संहहता में भूत विषय सामग्री एक-दो नहीं ग्यारह अध्यायों में देखने को ममलती है। रेिती कल्प में बाल ग्रह चिककत्सा का मुख्य रूप से प्रनतपादन ककया गया है। िाग्भट् ने भी भूत विद्या का प्रर्क सविस्त्तृत उल्लेख ककया है।
महवषा सुश्रुत ने भूत विद्या के सम्बन्ि में स्त्पष् रूप से मलखा है कक न्जस विद्या द्िारा देि, दैत्य, राक्षस, गन्ििा, यक्ष, वपतर, वपशाि, नाग ग्रहों से पीड़ड़त व्यन्तत का शान्न्त
कमा, बमलदान आहद कमा कियाओं द्िारा उपरोतत देिाहद देिों का उपशमन होता है िह भूत विज्ञान विद्या ही कही जाती है। हारनत संहहता में मलखा है कक ग्रह बािा, प्रेत, भूत, वपशाि, शाककनी, डाककनी आहद का ननग्रह ज्ञान ही िस्त्तुतः भूत विज्ञान अर्ाात् भूत विद्या है। िाग्भट््ािाया ने इसको ही ग्रह बािा चिककत्सा कहा है। यहाुँ ग्रह अर्िा ग्रह बािा शब्द से देिाहद अर्िा उनमें आिास का अर्ाात् शरीर में प्रिेश के अनुभि का बोि होता है। िरक संहहता के ्ीकाकार आिाया ििपाणण के अनुसार भूत अर्ाात् राक्षस आहद के ज्ञान तर्ा उनमें प्रशमन के मलए प्रयुतत विद्या को भूत विद्या कहा जाता है।
उपरोतत उदाहरणों से स्त्पष् होता है कक देि, असुर, गन्ििा, ककन्नर, भूत, प्रेत, वपशाि, राक्षस, वपतर, शाककनी-डाककनी आहद का मानि शरीर में आिेश तर्ा शांनत कमा, बमलदान, िूपन, अंजनाहद द्िारा उपशमन का ज्ञान न्जस विद्या से होता है उसको भूत विज्ञान कहा गया है।
मन और मानस शास्त्रों में पाश्िात्य देशों में 'Demonology' नाम से भूत विद्या प्रिमलत र्ी। भूत विज्ञान को 'Spiritual Science तर्ा भूतािेश को 'Scizure' नाम से
व्यापक रूप से माना गया है। भूताहद विषय में संसार के लगभग सभी िमा ग्रंर्ों में प्रत्यक्ष अर्िा परोक्ष रूप से वििरण ममलता है। भारतीय िांगमय में प्रेत योनन एिं उनका स्त्िरूप आहद, मानि पर उनका िोि, पीड़ड़त मानि के शरीर के लक्षण, उपशमन हेतु विचियों मंराहद वििान तर्ा विशेष रूप से सनातनी कमाकाण्ड में शांनत कमा का व्यापक रूप से िणान ममलता है।
भूत विज्ञान को आिुननक चिककत्सा पद्यनत में मानस रोग 'Psychitry' कहा गया है। 'Psychitry' शब्द 'Psychology' शब्द से सिार्ा मभन्न है। देखने में िैसे दोनों शब्द एक ही लगते हैं। परन्तु अमभप्राय दोनों के मभन्न है। 'Psychology' का अर्ा है प्राणी विशेष से व्यिहार तर्ा उसके िातािरण का अध्ययन। जबकक 'Psychitry' का तात्पया चिककत्सा शास्त्र की उस शाखा से है न्जसमें मानमसक रोगों का ननदान अर्िा चिककत्सा का ज्ञान ममलता है। मनोविकारों का भी कारण अव्यतत होने से भूतामभषंगित् विचिर व्यिहार को देखकर कनतपय मनोरोगों को भी अज्ञानतािश भूत ग्रह ही समझ मलया जाता है। लेककन सिाांश में भूताहद अमभनि रोगों को मानस रोग मान लेना बौद्चिकता नहीं है। यहद यह कहें
कक आिुननक मानस रोग विज्ञान 'भूत विज्ञान' का एक अंग अर्िा विभाग है तो अनतमशयोन्तत नहीं होगी।
देखा जाएं तो 'भूत विज्ञान' जैसे गूढ़ और न समझ में आने िाले पारलौककक विषयों का सम्बन्ि िस्त्तुतः तंर शास्त्र से है। भूत विज्ञान में िणणात देिाहदग्रह तर्ा मंर किया आहद तांत्ररक पद्यनत के अन्तगात आते हैं। भूत विद्या से सम्बन्न्ित तंत्ररक ग्रंर् यक्षक्षणी कल्प, यक्षक्षणी तंर, यक्षक्षणी पद्यनत, यक्षक्षण्ीी सािना आहद का अिलोकन करने से ज्ञात होता है कक इनमें विविि यक्ष-यक्षक्षणणयों के विषय में विस्त्तार से िणणात ककया गया है। इन लुप्त ग्रंर्ों में यक्ष-यक्षक्षणणयों को अपने िशीभूत करके उनसे विविि सांसररक भोग, सम्पवत्त आहद प्राप्त करने का उल्लेख भी ममलता है।
इसके अनतररतत भूत बािा ि उनके उपिार के सम्बन्ि में भूत-तंर, भूत लक्षण, भूत मलवप, मातृका पूजन, भूत वििेक, भूत-भूनतनी सािना, भूत-भैरि तंर आहद में भी उल्लेख ममलता है। ग्रंर्ों में मंर, मंर बीज आहद विषयक सामग्री भूत, यक्षाहद को मसद्ि करने के विचि-वििान िणणात हैं। भूत डामर नामक ग्रंर् में सुंदरी सािना, नाचगनी सािना, वपशािी सािना, वपशािी रहस्त्य, यक्षक्षणी, नाचगनी, अपस्राओं
के रहस्त्य तर्ा उनकी पूजा अिाना करके उनको अपने िश में करने जैसी अनेक बातों का सुन्दर और ताककाक वििरण ममलता है। परन्तु यह सब ज्ञान लुप्त और सुप्त है तयोंकक कालान्तर में ककसी ने भी इसको ननःस्त्िार्ा भाि से आगे बढ़ाने का यत्न ही नहीं ककया और न्जन्होंने ककया भी िह स्त्ियं ही लोक-समाज से प्रायः लुप्त और गुप्त रहे। यह अचिकांशतः आज के पररपेक्ष्य में अज्ञानी एिं व्यिसानयक िगा के हार् ही लगता रहा और इसका स्त्िार्ािश दोहन होता रहा। इसमलए इस ज्ञान का ताककाक एिं व्यिहाररक पक्ष पूरी तरह से न तो सािाजननक हो पाया और न ही सिाजनहहताय मसद्ि हो पाया और इसी मलए इसको सामान्यजन ने अंिविश्िास की श्रेणी में रख हदया।

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