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मंत्र

गोपाल राजू की पुस्तक
‘‘मंत्र जपके रहस्य’’
का सार-संक्षेप
मानसश्री गोपाल राजू
www.bestastrologer4u.com
30, ससविल लाईन्स, रुड़की - 247 667
सृष्टि से पहले जब कुछ भी नह ं था तब शून्य में िहां एक ध्िनन मात्र होती थी। िह ध्िनन अथिा नाद था ‘ओऽम’। ककसी शब्द, नाम आदद का ननरंतर गुंजन अथाात मंत्र। उस मंत्र में शब्द था, एक स्िर था। िह शब्द एक स्िर पर आधाररत था। ककसी शब्द आदद का उच्चारण एक ननष्चचत लय में करने पर विसशटि ध्िनन कंपन ‘ईथर’ के द्िारा िातािरण में उत्पन्न होते हैं। यह कंपन धीरे धीरे शर र की विसभन्न कोसशकाओं पर प्रभाि डालते हैं। विसशटि रुप से उच्चारण ककए जाने िाले स्िर की योजनाबद्ध श्रंखला ह मंत्र
होकर मुह से उच्चाररत होने िाल ध्िनन कोई न कोई प्रभाि अिचय उत्पन्न करती है। इसी आधार को मानकर ध्िनन का िगीकरण दो रुपों में ककया गया है, ष्जन्हें दहन्द िणामाला में स्िर और व्यंजन नाम से जाना जाता है।
मंत्र ध्िनन और नाद पर आधाररत है। नाद शब्दों और स्िरों से उत्पन्न होता है। यदद कोई गायक मंत्र ज्ञाता भी है तो िह ऐसा स्िर उत्पन्न कर सकता है, जो प्रभािशाल हो। इसको इस प्रकार से देखा जा सकता है :
यदद स्िर की आिृष्त्त ककसी कांच, बर्ा अथिा पत्थर आदद की स्िभाविक आिृष्त्त से समला द जाए तो अनुनाद के कारण िस्तु का कंपन आयाम बहुत अधधक हो जाएगा और िह बस्तु खडडण्त हो जाएगी। यह कारण है कक र्ौष्जयों-सैननकों की एक लय ताल में उठने िाल कदमों की चाप उस समय बदलिा द जाती है जब समूह रुप में िह ककसी पुल पर से जा रहे होते हैं क्योंकक पुल पर एक ताल और लय में कदमों की आिृष्त्त पुल की स्िभाविक आिृष्त्त के बराबर होने से उसमें अनुनाद के कारण बहुत अधधक आयाम के कंपन उत्पन्न होने लगते हैं, पररणाम स्िरुप पुल क्षनतग्रस्त हो सकता है। यह शब्द और नाद का ह तो प्रभाि है। अब कल्पना कररए मंत्र जाप की शष्क्त का, िह तो ककसी शष्क्तशाल बम से भी अधधक प्रभािशाल हो सकता है।
ककसी शब्द की अनुप्रस्थ तरंगों के साथ जब लय बध्यता हो जाती है तब िह प्रभािशाल होने लगता है। यह मंत्र का ससद्धान्त है और यह मंत्र का रहस्य है। इससलए कोई भी मंत्र जाप ननरंतर एक लय, नाद आिृष्त्त विशेष में ककए जाने पर ह काया करता है। मंत्र जाप में विशेष रुप से इसीसलए शुद्ध उच्चारण, लय तथा आिृष्त्त का अनुसरण करना अननिाया है, तब ह मंत्र प्रभािी ससद्ध हो सकेगा।
नाम, मंत्र, चलोक, स्तोत्र, चाल सा, अटिक, दशक शब्दों की पुनराािृष्त्त से एक चक्र बनता है। जैसे पृथ्िी के अपनी धुर पर ननरंतर घूमते रहने से आकषाण शष्क्त पैदा होती है। ठीक इसी प्रकार जप की पररभ्रमण कक्रया से शष्क्त का असभिद्धान होता है। पदाथा तंत्र में पदाथा को जप से शष्क्त एिं विधुत में पररिनतात ककया जाता है। जगत का मूल तत्ि विधुत ह है। प्रकंपन द्िारा ह सूक्ष्म तथा स्थूल पदाथा का अनुभि होता है। िृक्ष, िनस्पती, विग्रह, यंत्र, मूनता, रंग, रुप आदद सब विद्युत के ह तो काया हैं। जो स्ितःचासलत प्राकृनतक प्रकक्रया द्िारा संचासलत हो रहे हैं। परंतु सुनने में यह अनोखा सा लगता है कक ककसी मंत्र, दोहा, चोपाई आदद का सतत जप काया की ससवद्ध भी करिा
सकता है। अज्ञानी तथा नाष्स्तक आदद के सलए तो यह रहस्य-भाि ठीक भी है, परंतु बौवद्धक और सनातनी िगा के सलए नह ं।
रुद्रयामल तंत्र में सशिजी ने कहा भी है - ‘‘हे प्राणिल्लभे। अिैटणि, नाष्स्तक, गुरु सेिा रदहत, अनथाकार , क्रोधी आदद ऐसे अनाधधकार को मंत्र अथिा नाम जप की मदहमा अथिा विधध कभी न दें। कुमागागामी अपने पुत्र तक को यह विद्या न दें। तन-मन और धन से गुरु सुश्रुषा करने िालों को यह विधध दें।’’
ककसी भी देिी-देिता का सतत् नाम जप यदद लयबद्धता से ककया जाए तो िह अपने में स्ियं ह एक ससद्ध मंत्र बन जाता है। जप की शास्त्रोक्त विधध तो बहुत ह ष्क्लटि है। ककसी नाम अथिा मंत्र से इक्षक्षत र्ल की प्राष्तत के सलए उसमें पुरुचचरण करने का विधान है। पुरुचचरण कक्रया युक्त मंत्र शीघ्र र्लप्रद होता है। मंत्रादद की पुरुचचरण कक्रया कर लेने पर कोई भी ससद्धी अपने आराध्य मंत्र के द्िारा सरलता से प्रातत की जा सकती है। पुरुचचरण के दो चरण हैं। ककसी काया की ससद्धी के सलए पहले से ह उपाय सोचना, तदनुसार अनुटठान करना तथा ककसी मंत्र, नाम जप, स्तोत्र आदद को अभीटि काया की ससवद्ध के सलए ननयमपूिाक सतत् जपना इटि ससवद्ध की कामना से सिाप्रथम मंत्र, नामादद का पुरचचरण कर लें। अथाात मंत्र में ष्जतने अक्षर हैं उतने लाख जप करें। मंत्र का दशांश अथाात दसिां भाग हिन करें। हिन के सलए मंत्र के अंत में ‘स्िाहा’ बोलें। हिन का दशांश तपाण करें। अथाात मंत्र के अंत में ‘तपायामी’ बोलें। तपाण का दशांश माजान करें अथाात मंत्र के अंत में ‘माजायासम’ अथिा ‘असभससन्चयामी’ बोलें। माजान का दशांश साधु ब्राह्मण आदद को श्रद्धा भाि से भोजन कराएं, दक्षक्षणादद से उनको प्रसन्न करके उनका आशीिााद लें। इस प्रकार पुरुचचरण से मंत्र साधक का कुछ भी असाध्य नह ं रह जाता।
अपने-अपने बुवद्ध-वििेक अथिा संत और गुरु कृपा से आराध्य देि का मंत्र, नाम, स्तोत्रादद चुनकर आप भी उसे सतत् जपकर जीिन को साथाक बना सकते हैं। लम्बी प्रकक्रया में न जाना चाहें तो अपने आराध्य देि के शत, कोदि अथिा लक्ष नाम जप ह आपके सलए प्रभािशाल मंत्र ससद्ध हो सकते हैं। भौनतक इक्षाओं की पूनता के सलए आप सरल सा उपाय भी कर सकते हैं। बौवद्धक पाठक गण यदद मंत्र सार, मंत्र चयन आदद की विस्तृत प्रकक्रया में भी जाना चाहते हैं तो िह पुस्तक ‘मंत्र जप के रहस्य’ से लाभ उठा सकते हैं।
प्रस्तुत प्रयोग पूरे 100 ददन का है अथाात इसे सौ ददनों में पूरा करना है। बीच में
यदद कोई ददन छूि जाए तो उसके स्थान पर उसी क्रम में ददनों की संख्या आप आगे भी बढ़ा सकते हैं। ष्जस प्रयोजन के सलए नाम, मंत्रादद, जप प्रारम्भ कर रहे हैं उसके अनुरुप बैठने का एक स्थान सुननष्चचत कर लें :
प्रयोजन स्थान
सिा काया ससवद्ध अगस्त्य अथिा पीपल के नीचे
लक्ष्मी कृपा कैथ अथिा बेल िृक्ष के नीचे
संतान सुख आम, मालती अथिा अलसी िृक्ष के नीचे
भूसम-भिन जामुन िृक्ष के नीचे
धन-धान्य बरगद अथिा कदम्ब िृक्ष के नीचे
पाररिाररक सुख वििाह आदद ककसी नद का ति
आरोग्य अथिा आयुटय सशि मष्न्दर
सिाकामना ससवद्ध देिालय अथिा पवित्र नद का ति
प्रयोग काल में शब्द, नाम अथिा मंत्रादद आपको अपने प्रयोजन हेतु ष्जस पत्र पर सलखना है, उसका वििरण ननम्न प्रकार से है :
प्रयोजन पत्र
सुख-समृवद्ध केले के पत्र पर
धन-धान्य भोजपत्र पर
मान-सम्मान पीपल पत्र पर
सिाकामना ससवद्ध अनार के पत्र पर
लक्ष्मी कृपा बेल के पत्र पर
मोक्ष तुलसी पत्र
धन प्राष्तत कागज पर
संतान-गृहस्त सुख भोज पत्र पर
िैसे तो अटि गंध की स्याह सिाकामना हेतु ककए जा रहे मंत्र के अनुसार ननम्न
काया हेतु ककए जा रहे मंत्र ससवद्ध के सलए उपयुक्त है तथावप महाननिााण तंत्र के अनुसार
ननम्न काया हेतु अलग-अलग स्याह भी चुन सकते है :
प्रयोजन स्याही
सिा काया ससवद्ध केसर तथा चंदन
मोक्ष सर्ेद चंदन
धनदायक प्रयोग रक्त चंदन
आरोग्य गोरोचन तथा गोदुग्ध
संतान सुख चंदन तथा कस्तूर
शुभ काया गोरोचन, चंदन, पंच गंध
(सर्ेद तथा लाल चंदन, अगर तगर तथा केसर)
ककसी शुभ मुहूता तथा होराकाल में गणपनत जी का ध्यान करके सरलतम ् विधध
द्िारा मंत्र कक्रया प्रारम्भ करें। कौन सा मंत्र अथिा नाम आदद ससवद्ध के सलए चुन रहे है
तथा मूलतः आपका इस ससवद्ध के पीछे प्रयोजन क्या है आदद सब पूिा में ह सुननष्चचत
कर लें। तदनुसार 11 पत्र अपने पास रख लें। चुने गये शुभ काया में भूत शुवद्ध, प्रणायाम
आदद से प्ररांभ करके चुने गए नाम अथिा मंत्र आदद से संबद्ध देि का सुन्दरतम रुप अपने
मन में बसा लें। उनकी संक्षक्षतत अथिा सुविधानुसार षोड्शोपचार मानससक पूजा कर लें।
प्रारंभ में प्रेम भाि से 3 बार प्रणि ‘ॐकार’ का उच्चारण करके मंत्रादद की 11 माला जप
करें। कायाानुसार िैसे तो माला का चयन भी आिचयक है तथावप अपने ककसी भी प्रयोजन
के सलए कमलगििे की माला आप प्रयोग कर सकते हैं। माला न भी सुलभ हो तो करमाला
से जप प्रारंभ कर सकत े हैं। जो पाठकिंदृ जप की विस्ततृ प्रकक्रया में जाना चाहत े हैं िह
मंत्र जप संबन्धी अन्य सामग्री भी देख सकते हैं। मेर पुस्तक ‘मंत्र जप के रहस्य’ भी
संभितः इन सब बातों के सलए उपयोगी ससद्ध हो। आपका म ुह पूरब अथिा उत्तर ददशा
में होना चादहए। 11 माला जप के बाद 11 बार यह नाम अथिा यह मंत्र आप कायाानुसार
चुने हुए पत्र पर स्याह से अंककत कर लें। जप ननरंतर चलता रहे। मंत्र यदद लम्बा है और
11 पत्रों में न सलखा जा पा रहा हो तो पत्रों की संख्या आप आिचयकतानुसार बढ़ा भी
सकते हैं। अच्छा हो यदद यह सब व्यिस्था आप पूिा में ह सुननष्चचत कर लें। यह कक्रया
अथाात मंत्र जप और 11 बार लेखन आपको कुल 100 बार 100 ददनों अथिा बीच में
कक्रया छूि जाने के कारण उतने ह अधधक ददनों में पूणा करने हैं। अंत में सलखे हुए सब
जमा पत्र कह ं बहते हुए जल में विसष्जात कर दें। विकल्प के रुप में यह पत्र अपने भिन
के ककसी शुभ स्थल जैसे पूजा ग्रह, रसोई अथिा ब्रह्म स्थल आदद में नीचे धरती में दबा
सकते हैं। यह भी सुलभ न हो तो यह पत्र ककसी शुभ िृक्ष की जड़ में भी दबा सकते हैं।
पूरे अनुटठान काल में यदद आप ननरासमष, अकेले रहें तथा एक ह बार भोजन
ग्रहण करें तो िांनछत र्ल की प्राष्तत शीघ्र होगी। यदद यथा संभि ननम्न बातों का और
ध्यान रख सकते हैं, तब तो सोने पे सुहागा है :
- मंत्र कक्रया का उददेचय साष्त्िक तथा दुटकामना से दूर हो।
- प्रयोग काल में मन, कमा ि िचन से आप शुद्ध हों।
- ब्रह्मचया तथा कुशासन अथिा कंबल का प्रयोग करें।
- लेखन काया उसी नाप अथिा मंत्रोच्चार साथ-साथ करें। इस काल में जप के
अनतररक्त कुछ न बोलें।
- प्रयास रखें कक प्रत्येक ददन का प्रयोग एक ननष्चचत समय तथा समयािधध
में ह पूणा करें।
- सकाम अनुटठान साधक कम से कम उक्त ननयम का अिचय अनुपालन
करें। ननटकाम जप अथिा लेखन काल में तो ककसी भी देश, काल एिं
पररष्स्थनत आदद का बंधन है ह नह ं।
- संयम और अंतःकरण की पवित्रता का सदैि ध्यान रखें।
मानसश्री गोपाल राजू

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