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बज़रिए ऑरकुट मुझे श्रद्धेय गुरु जी से मिलने का सौभाग्य मिला । आपसे विचार-विनमय के जितने भी संयोग घटित हुए प्रायः उन सबमें मैंने स्वयं को उज्व्र्वस्वित पाया । आपमें सदैव मुझे एक विशिष्ट दैवीय आभा दिखी है । समय समय पर मैं उनसे लाभान्वित होता रहा हूँ । ईश्वर से प्रार्थना है की वे उन्हें शतायु करें जिससे जनकल्याण के मिशन का लाभ सबको मिलता रहे ।
*डॉ. आशुतोष, बनारस
राजू भैया के मार्गदर्शन से घर में शांति व पैसा स्थाई रूप से रहने लगा । नौकरी में भी लाभ हुआ । बेटे को विशेष रूप से अच्छा लग रहा है और वह आगे प्रगति कर रहा है ।
*पूनम शर्मा, वैशाली
गोपाल राजू जी के द्वारा किये गए उपाय और पूजा से मुझे बहुत राहत मिली है । मनचाही जगह सरकारी अस्पताल में मेरी पोस्टिंग हो गयी है ।
*डॉ. सोनिआ, झाँसी
My sincere regards and thnks for your support and guidance. I am feeling much better and getting unexpected favorable results.All because of your blessings. In gratitude....
*A. K. Doval, New Delhi
जब से मैंने श्री गोपाल जी द्वारा बताई पूजा शुरू की है मैं mentally अपने को बहुत strong feel कर रही हूँ.। confidence आता जा रहा है । कहाँ मैं बिलकुल ही depression में चली गयी थी । अब लगता है कि जैसे धीरे-धीरे सब जल्दी ही ठीक होने वाला है एक चमत्कार की तरह ।
*सीमा, मेरठ
मान्यवर महोदय चरण स्पर्श । मैं बहुत ही गरीब इंसान हूँ । आपके बताये मार्ग पर चलकर अपने अच्छे से जीविका चल रहा हूँ । आप पर पूरा विश्वास है कि आप मेरे लिए और भी अच्छा करेंगे । आपकी कृपा से मेरी किताब भी छापकर आ गयी है । ये मैंने आपको ही समर्पित की है । यह आपकी कृपा का ही फल है । मेरी दूसरी किताब भी आने वाली है । यह भी आपको ही समर्पित है ।
*भीखा राम, डीरा, जोधपुर
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*Anu Chaurasia, Delhi



लाल किताब से भाग्यशाली रत्न चयन

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मूल शोधपरक लेख

लेखक की पुस्तक

स्वयं चुनिए अपना भाग्यशाली रत्न

का सारे संक्षेप

  

 

लाल किताब से भाग्यशाली रत्न चयन


     शकुन तथा टोटकों का श्री गणे कब और कैसे हुआ, यह विवादास्पद है - पहले अण्डा आया अथवा मुर्गी की तरह। सम्भवतः जीवात्मा जब अपनी परछाई देखकर डरा होगा तो उसने आत्मरक्षा के उपाय खोजना प्रारम्भ कर दिए होंगे और उसी श्रंखला में शकुन और टोटकों का भी प्रारम्भ हो गया होगा।

     रहस्यमयी ब्रह्माण्ड से मानव कल्याण के लिए ऋषि एवं महर्षियों के सूक्ष्मज्ञान द्वारा अनेक गुह्य सिद्धांत प्रतिपादित हुए। काल क्रमानुसार इनमें कुछ कृतिबद्ध हुए, कुछ मौखिक ही चलन में चलते रहे और अनेक उनमें से लोप होते चले गए। अरुण संहिता अर्थात् लाल किताब इसी क्रम में एक ऐसी कृति है जो टोटकों तथा उपायों से भरी हुई है। संस्कृत की मूल कृति किसी प्रकार अरब के आब नामक स्थान पर पहॅुच गयी, वहॉ इसका अरबी तथा फारसी में अनुवाद हुआ। इस सदी में इसका उर्दू में अनुवाद हुआ। लाल किताब के विषय में और भी अनेक किबदंतियॉ प्रचलित हैं। सत्य क्या है, यह तो राम जाने ? परंतु यह सत्य है कि लाल किताब में वर्णित टोटके भाग्य को पढ़ने और अनिष्ट से रक्षा करने के लिए चमत्कारी रुप से प्रभावशाली है। रत्नों द्वारा सौभाग्य प्राप्त करने का भी इसमें वर्णन मिलता है, परंतु वह आधा अधूरा है। आवश्यता है कि इस ज्ञान को समझने की, उसमें अधिक खोज करने की, तदनुसार व्यवहार में लाने की ताकि अधिकारिक रुप से मानव कल्याण हो सके। व्यवसायिकता से दूर हटा कर मेरे शोधपरक कार्य को अपने बुद्धि-विवेक से और आगे बढ़ाने का एक और प्रयास करके तो देखिये, कितने संतोष जनक परिणाम आपको मिलते हैं।

     ज्योतिष शास्त्र की तरह लाल किताब में भी लग्न कुण्डली बनायी जाती है। प्रयुक्त कुण्डली बस्तुतः पारम्परिक जन्म कुण्डली ही है। जन्म कुण्डली में ग्रहों को यथा स्थान रहने दें, जिन राशियों वह हैं, उन्हें हटा दें। अब लग्न को 1(मेष) राशि मानते हुए दूसरे, तीसरे, आदि 12 भावों में क्रमशः 2(वृष), 3(मिथुन) आदि 12 राशि 12(मीन) तक लिख दें। यह कुण्डली लाल किताब का आधार है।

पाठक ध्यान दें, लग्न कुण्डली में चाहे जो राशि हो लाल किताब की कुण्डली में सदैव मेष राशि ही रहती है। इसी प्रकार क्रमशः दूसरे में वृष, तीसरे में मिथुन आदि मीन तक बारहों राशियॉ रहती है। यह इन घरों की पक्की राशियॉ कहलाती हैं।

     जो ग्रह शत-प्रतिशत शक्तिशाली होते हैं, वह उच्च के ग्रह कहे जाते हैं तथा जो ग्रह निर्बल होते हैं, वह नीचे के कहे जाते हैं। कुण्डली में इनके स्थान भी सुनिश्चित हैं, यथा

 

 

स्पष्ट ग्रह शुभता प्रदान करने में पूर्ण रुप से सहयोगी सिद्ध होता है। ज्योतिष शास्त्र के नियमों की तरह प्रत्येक ग्रह की अपनी दृष्टि विशेष होती है। सूर्य, चंद्र, गुरु तथा बुद्ध अपने से सातवें भाव को देखता है। गुरु, राहु, केतु अपने से पॉचवे, सातवें तथा नवे भाव को देखते हैं। मंगल चौथ, सातवे, आठवे भावों को तथा शनि अपने से तीसरे, सातवे तथा दसवे भाव को देखता है। प्रत्येक ग्रह सातवे भाव को अवश्य देखता है।

     लाल किताब से रत्न चयन करने के लिए यह परिचय पूर्ण नहीं कहा जा सकता तदापि यह भूमिका विषय को समझाने और व्यवहार में लाने की कुंजी अवश्य सिद्ध हो सकती है। किसी कुण्डली में यदि बलवान है, लाल किताब की भाषा में कहें कि यदि वह अपने पक्के ग्रहों में स्थित है तो उनसे संबंधित रत्न धारण किया जा सकता है। किताब सदैव उच्च अर्थात शत-प्रतिशत शक्तिशाली ग्रहों के रत्न धारण करने पर बल देती है। ऐसे योग कुण्डली में खेाजना बहुत ही सरल है। परन्तु यदि कुण्डली में शक्तिशाली ग्रह अथवा ग्रहों का अभाव हो तो सुप्त ग्रह तथा सुप्त भाव को बलवान करने का प्रयास करना चाहिए। यह विधि जितनी सरल है उतनी ही अधिक प्रभावशाली भी सिद्ध होगी। भारत अग्रवाल नामक रुड़की में जन्में एक व्यक्ति के वास्तविक उदाहरण से आपको रत्न चयन करना अधिक सरल हो जाएगा।

     जन्म समय : 22 सितंबर 1967, दिन में 3 बजे

 

 

कुण्डली में चंद्र ग्रह सर्वाधिक बलशाली है। यहॉ चंद्र का रत्न अथवा उपरत्न धारण करावाया जा सकता है। परन्तु इसके साथ-साथ सुप्त भाव तथा सुप्त ग्रह को बलवान कर लिया जाए तो परिणाम अधिक अच्छे होंगे। कुण्डली में सर्वाधिक भाग्यशाली ग्रह उच्च भाव का द्योतक है। भाग्य के लिए सर्वोत्तम ग्रह तदनुसार रत्न उपरत्न आदि का चयन निम्न चार बातों की सहायता से किया जा सकता है -

1. जिस राशि में ग्रह उच्च का होता है और लाल किताब की कुण्डली के अनुसार उसी भाव अर्थात राशि में स्थित होता है, तो उससे संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है।

2. यदि ग्रह अपने स्थाई भाव में स्थित हो तथा उसका कोई मित्र ग्रह उसके साथ हो अथवा उसको देखता हो तो उस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है।

3. 9 ग्रहों में से जो ग्रह श्रेष्ठतम भाव में स्थित हो तो उस ग्रह से  संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है।

4. कुण्डली के केन्द्र अर्थात 1, 4, 7 तथा 10 वे भाव में बैठा ग्रह भी भाग्यशाली रत्न इंगित करता है।

5.   यदि उक्त भाव रिक्त हो तो नवां, नवां रिक्त तीसरा, तीसरा रिक्त हो तो गयारहवां और यह रिक्त हो तो छठा, छठा भाव भी रिक्त हो तो बारहवे भाव में बैठा ग्रह भाग्य ग्रह कहलाता है। इस ग्रह से संबंधित रत्न भाग्य रत्न होता है।

जब किसी भाव पर किसी भी ग्रह की दृष्टि नहीं होती अर्थात् यह भाव किसी भी ग्रह द्वारा देखा नहीं जाता तो वह सुप्त भाव कहलाता है। उदाहरण में पहला तथा सातवां ऐसे ही सुप्त भाव है। इन दोनों भावों को कोई भी ग्रह नहीं देख रहा है। इसलिए यदि इन भावों को चैतन्य कर देने वाले ग्रहों का उपाय किया जाए तो भाव चैतन्य हो जाऐगें और यदि इन भावों संबंधित विषय में व्यक्ति को आशातीत लाभ मिलने लगेंगे।

 

सुप्त भाव चैतन्य करने वाले ग्रह

सुप्त भाव

1.

2.

3.

4.

5.

6.

7.

8.

9.

10.

11.

12.

कौन सा ग्रह चैतन्य करेगा

मंगल

चंद्र

बुध

चंद्र

सूर्य

राहु

शुक्र

चंद्र

शनि

शनि

गुरु

केतु

 

भारत अपने शारीरिक तथा ग्रहस्थ जीवन से बुरी तरह से त्रस्त है। पाठक ध्यान दें, इनका पहला भाव सुप्त है। जो शरीर तथा स्वास्थ का द्योतक है। सातवां भाव भी सुप्त है। यह पत्नी, पारीवारिक जीवन आदि का कारक है। उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि पहले भाव को बलवान करने के लिए शुक्र को बलवान करने की आवश्यकता है। इन ग्रहों से संबंधित रत्न मूंगा तथा हीरा दोनों समस्याओं में सहायक सिद्ध होगा।

     जब कोई ग्रह कोई अन्य ग्रह को नहीं देखता तो वह सुप्त ग्रह कहलाता है। यहॉ शुक्र तथा मंगल ऐसे ग्रह हैं जो किसी भी ग्रह को नहीं देख रहे, इसलिए इनके अधिष्ठित रत्न भाग्यशाली सिद्ध होगें। पाठक यहॉ विचित्र संयोग देखें कि भाव सुप्त ग्रह तथा ग्रह सुप्त को चैतन्य करने के लिए एक से ही रत्न निकलें हैं।

     सुप्त ग्रह कब जाग्रत होंगे। अर्थात आयु के किस वर्ष में फल देंगे, इसका विवरण भी लाल किताब में मिलता है। यह वय में खोज किए हुए ग्रह की रत्न आदि प्रयोग किए जाते हैं। जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यथा उपाय उपयोगी सिद्ध होते हैं। सौभाग्य से भारत के लिए इससे भी मूंगा तथा हीरा रत्न निकलता है। रत्नों के इस संयोग से उन्हें लाभ पहुचा है। पाठकों लाभार्थ रत्न तथा धारण की आयु भी सारणी के रुप में दे रहा हॅू -

सुप्त ग्रह विवरण सारणी

 

सुप्त ग्रह का नाम

किस प्रयोजन में चैतन्य होंगे

किस आयु में चैतन्य होगा

सूर्य

राजकीय संबंधी कार्य

22 वर्ष बाद

चंद्र

शिक्षा संबंधी कार्य

24 वर्ष बाद

मंगल

स्त्री संबंधी कार्य

28 वर्ष बाद

बुध

व्यापार तथा विवाह संबंधी कार्य

34 वर्ष बाद

गुरु

व्यापार संबंधी कार्य

16 वर्ष बाद

शुक्र

विवाह के बाद भाग्योदय संबंधी कार्य

25 वर्ष बाद

शनि

भूमि-भवन संबंधी कार्य

36 वर्ष बाद

श्राहु

ससुराल संबंधी कार्य

42 वर्ष बाद

केतु

संतान के जन्म संबंधी कार्य

48 वर्ष बाद

 

भाग्यशाली रत्न चयन संबंधी ऐसी अनेक विधियां वर्णित मैने अपनी पुस्तक में दी हैं। रत्न ज्योतिष संबंधी विश्वस्तर पर आज तक आज तक ऐसा प्रयास किसी नहीं किया था। ऐसे हीे अनेक अन्य शोधपूर्ण कार्य भी प्रगति पर हैं। रत्न विषयक जिज्ञासु स्नेही पाठकों के लिए सूत्र तथा उन्हें खोलने की कुंजी अवश्य दे कर जा रहा हॅू। अपने बुद्धि विवेक से इस विषय को और भी आगे बढ़ाएं।

 


गोपाल राजू (वैज्ञानिक)

 


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