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Very nice sir
*Rajesh vashist
मुझे याद है जब इंटर में निकलने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था । गोपाल अंकल से मिलकर मेरा जीवन ही बदल गया । आज मैं एक सफल इंजीनियर हूँ और जयपुर में एक अच्छी नौकरी पर हूँ । उनके बताये पूजा-पाठ को अब मैंने जीवन का एक अंग बना लिया है । मैं ही जनता हूँ कि मुझे क्या मिला है । अंकल को कोटिश नमन ।
*चिराग़, जयपुर
आदरणीय अंकल, आपके सहयोग से मैंने अपना उद्देश्य पा लिया है । सिर्फ ये कहूँगी कि अत्यंत सहयोगी और निःस्वार्थ भावना से परिपूर्ण है आपका व्यक्तित्व ।
*मनीषा, नॉएडा
आदरणीय अंकल । आपकी कृपा से मुझे मेरे पारिवारिक जीवन को बचाने में बहुत सहयोग मिला है । आप सबको सदा याद रक्खूँगी और आपकी भलाई को भी ।
*निशा, इंदौर
The result of my daughter for her CA exam is now favorable; this is all because of puja performed by Sh Gopal Raju Jee
* Ms. Geeta Rathi, Jodhpur (Raj.)
My son Ashutosh has been settled in a respective job. Combination of three gemstones provided by Sh Gopal ji has proved the most effective in his career settlement.
*Tejpal Singh, Muzaffernagar
I have cleared my exam for the bank services after doing puja and bajrag baan. Kindly keep your ashirwad on us in future also.
*Jai Krishan Sharma, Jodhpur



वास्तु एवं वृक्षारोपण

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गोपाल राजू की चर्चित पुस्तक,

स्वयं चुनिए अपना भाग्यशाली रत्न

का सार-संक्षेप

 

वास्तु एवं वृक्षारोपण

    प्राचीन एवं मध्ययुगीन नगर तथा भवनों के भग्नावशेष, अनेक मंदिर, दुर्ग और भवन उत्कृष्ट भारतीय स्थापत्य के प्रमाण हैं। अपने प्रारंभिक काल में भारतीय वास्तु विद्या शिल्पशास्त्र का ही एक अंग रही। कालान्तर में स्थापत्य की विभिन्न शैलियों के विकास के साथ-साथ वास्तु विद्या एक स्वतंत्र शास्त्र के रुप में अस्तित्व में आई और वास्तु ग्रंथों की एक समृद्व परंपरा बनी। स्थापत्य की प्रमुख शैलियों में उत्तर भारत की नागर शैली और दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली दो विभिन्न परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।

 

             प्रारंभ में वास्तु शास्त्र संबंधी साहित्य, पुराण, आगम, ज्योतिष एवं शिल्पादि के ग्रंथों का भाग रहा। विश्वकर्मा वास्तु शास्त्र एवं समरांगण सूत्रधार उत्तर भारत के स्थापत्य की प्रतिनिधि रचनाएं हैं। इसी प्रकार मानसार एवं मयमत दक्षिण भारत के स्थापत्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन ग्रंथों के रचना काल के विषय में कोई सर्वसंमत एवं निश्चित मत नहीं है। डा.प्रसन्न कुमार आचार्य के अनुसार मानसार के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य कुछ ग्रंथ भी भारतीय इतिहास के इसी स्वर्णिम काल में रचे गए और इसके पश्चात् शास्त्रीय ग्रंथों की परम्परा लगभग 1000 वर्ष तक चलती रही। अस्तु।

 

             वास्तु शास्त्र के प्रचाीन नियमों, नारदसंहिता, यजुर्वेद, कौटिल्य के वास्तु नियमों के अनुरुपवृक्षारोपणइस लेख का मूलविषय है। यह वह नियम हैं जिन्हें सर्वथा भुला दिया है। मत्स्यपुराण, अग्निपुराण, भविष्य पुराण, पद्म पुराण, नारद पुराण, भागवत् गीता, रामायण, शतपथ ब्रासण, तंत्रसार, मंत्रमहोदघि, योगनिघन्टु आदि महाग्रंथों में वृक्ष एवं लताओं का अनेक स्थान पर वर्णन आता है। पद्म पुराण में लिखा है कि जलाशय के समीप पीपल का वृक्ष लगाने से व्यक्ति को सैकड़ों यज्ञों का पुण्य मिलता है। इसका स्पर्ष करने से चंचला लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इसके दर्शन मात्र से ही चित्त प्रसन्न होता है एवं पाप नाश होते हैं। अशोक वृक्षारोपण शोक नाशक होता है। पाकर का वृक्ष यज्ञ तुल्य फल प्रदान करता है। जामुन का वृक्ष कन्या रत्न की प्राप्ति कराता है। मौलसरी वृक्ष कुल की वृद्धि करता है। चम्पा के पौधे को सौभाग्यशाली माना गया है। कटहल का वृक्ष धन-लक्ष्मी प्रदाता होता है। नीम के वृक्ष से सूर्य देव की कृपा मिलती है। नीम का वृक्ष दीर्घायुष्य प्रदान करता है। आदि आदि।

 

             वास्तु शास्त्र के अनुसार पीपल, बढ़, नीम, नारियल, चंदन, सुपारी, बेल, आम, अशोक, हल्दी, तुलसी, चम्पा, बेला, जूही, आंवला, अंगूर, अनार, नागकेसर, मौलसरी, हरसिंहार, गेंदा, गुलाब आदि पेड़ पौधों को अत्यंत शुभ माना गया है। वास्तुविदों में एक दूसरा समूह भी है जो वृक्ष, फूल-पौधों को मात्र अलंकरण का उपक्रम मानते हैं। परन्तु यह मत सर्वथा अनुचित है। यदि व्यक्ति वास्तु के अन्य नियमों के साथ-साथ वृक्षारोपण पर भी थोड़ा सा समय दान दे दे तो व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है, इसमें संशय नहीं है। वैसे तो व्यक्ति अपनी सामर्थ्य और समयानुसार यह नियम अपनाएं परन्तु यदि वह थोड़ा सा भी गंभीर होकर नियमानुसार तथा अपनी राशि, नक्षत्र आदि के अनुरुप वृक्षारोपण करता है तो उसको वास्तु के समस्त शुभफलों का सुख मिलेगा ही मिलेगा।

 

             शास्त्रों में घर के पूरब दिशा में बरगद, पश्चिम दिशा में पीपल, उत्तर दिशा में कैत अथवा पाकर, बेर तथा दक्षिण दिशा में गूलर लगाना शुभ माना गया है। भवन के अन्दर लगी तुलसी वहॉ के लिए कल्याणकारी, धन, पुत्र तथा आयुष्य प्रदान करती है। प्रातः तुलसी के दर्शन मात्र से सोने के दान जैसा पुण्य-फल मिलता है। सांध्यकाल में तुलसी के नीचे दीपक जलाने से सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है। घर के दक्षिणी भाग को छोड़कर हर दिशा में तुलसी शुभ है। घर की वाटिका के ईशान में कटहल, आम तथा ऑवला, नैऋत्य में जामुन तथा इमली, अग्नि दिशा में अनार तथा वायव्य दिशा में बेल के वृक्ष लगाना शुभफल देते हैं। कुछ ग्रंथकार मानते हैं कि घर के दक्षिण दिशा की वाटिका में पाकड़, पश्चिम में वट, उत्तर में उदुम्बर तथा पूरब में पीपल के वृक्ष लगाने शुभ नहीं है। इसी प्रकार घर के अंदर अंगूर, चमेली, चम्पा तथा कॉटेंदार फल-फूल अशुभ का प्रतीक हैं। परन्तु वह इन वृक्षों तथा बेल, अशोक, मौलश्री तथा अनेक पुष्प-लताओं के मण्डप घर के समीप लगाने को शुभत्व का प्रतीक मानते हैं। यह कहा गया है कि कॉटेंदार फल-फूल तथा वृक्ष शत्रुता उत्पन्न करते हैं। दूध वाले वृक्ष जैसे बढ़, आक तथा पीपल आदि को भी कुछ विद्वान सम्पत्ति नाशक मानते हैं। फलदार वृक्षों को कुछ लोग सम्पत्ति हनन कर्ता मानते हैं। फलदार वृक्षों की लकड़ी तक घर में प्रयोग करने के पक्ष में यह विद्वान नहीं हैं। वह कहते हैं कि यह घर की सम्पत्ति और संतति का नाश करते हैं। 

 

पौराणिक ग्रंथ - नारद पुराण, ज्योतिष ग्रंथ - नारद संहिता, आयुर्वेदिक ग्रंथ - राजनिघंटु, नारायणी संहिता, वृहत् शुश्रुत तथा तांत्रिक ग्रंथ - शारदा तिलक, मंत्र महार्णव, श्री विद्यार्णव आदि में व्यक्ति विशेष की राशि तथा नक्षत्र के अनुसार वृक्षारोपण का एक निश्चित क्रम दिया हुआ है। यदि कोई अपनी सामर्थ्य, स्थान की सुविधा आदि के अनुरुप पूर्वाभिमुख होकर तथा पंचोपचार पूजन विधि द्वारा वृक्षारोपण करता है तो उसे दैहिक, दैविक तथा भौतिक समस्त प्रकार की व्याधियों से मुक्ति मिलती है। यदि किन्हीं अभावों में व्यक्ति वृक्षारोपण का सम्पूर्ण क्रम रोपित नहीं कर पाता तो उसे अपनी राशि अथवा नक्षत्र के अनुसार कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगा लेना चाहिए इससे पर्यावरण में तो सुधार होगा ही, व्यक्तिगत वास्तु दोषों को भी निवारण होगा।

 

अपने जन्म लग्न के अनुरुप वृक्षारोपण

 

जहॉ वृक्षारोपण लग्न क्रम में रोपित करना है वहॉ पूरब दिशा में अपनी लग्न का वृक्ष लगा दें। यहॉ से विपरीत घड़ी की दिशा में क्रम से अन्य वृक्ष लगा लें। यह वृक्ष आयताकार, वर्गाकार अथवा वृत्ताकार किसी भी क्रम में लगाए जा सकते हैं। साथ दिए चित्र से इस विधि द्वारा वृक्षारोपण और स्पष्ट हो जाएगा।

 

             माना आपका लग्न मेष में उदय हुआ है। इससे आपका लग्न वृक्ष खादिर हुआ। पहला वृक्ष आप खादिर का लगाए फिर क्रमशः 2 के स्थान पर गूलर, 3 के स्थान पर अपामार्ग आदि नीचे दिए किसी भी आकृति में लगा दें।

नवग्रह वृक्ष रोपण विधि

 

नवग्रह वृक्ष रोपण विधि वर्गाकार आकार में साथ दी आकृतिनुसार वृक्षारोपण करें। केवल इस बात का ध्यान रखना है कि उत्तर दिशा में पीपल का वृक्ष रहे। शेष वृक्षों का क्रम ठीक साथ दिए चित्र के अनुसार ही रखना है।

जन्म राशि अथवा नाम राशि से वृक्षारोपण

 

यदि अधिक वृक्ष लगाने की क्षमता अथवा सामर्थ्य नहीं है अथवा स्थानाभाव है तो अपनी राशि का वृक्ष चुनकर कहीं भी लगा दें और फलने-फूलने तक उसकी सेवा करें।

राशि

सम्बन्धित वृक्ष

मेष

खादिर

वृष

गूलर

मिथुन

अपामार्ग

कर्क

पलाश

सिंह

आक

कन्या

दुर्वा

तुला

गूलर

वृश्चिक

खादिर

धनु

पीपल

मकर

शमी

कुंभ

शमी

मीन

कुश

 

जन्म नक्षत्र से वृक्षारोपण

जिनको अपना जन्म नक्षत्र ज्ञात है, वह उस नक्षत्र से सम्बन्धित वृक्ष वास्तु नियमानुसार कहीं भी लगा सकते हैं।

नक्षत्र

सम्बन्धित वृक्ष

अश्विनी

कुचिला अथवा बॉस

मरणी

ऑवला अथवा फालसा

कृतिका

गूलर

रोहिणी

जामुन अथवा तुलसी

मृगशिरा

खैर

आर्द्रा

शीशम अथवा बहेड़ा

पुनर्वसु

बॉस

पुष्य

पीपल

आश्लेषा

नगकेसर अथवा गंगेरन

मघा

बरगद

पू.फाल्गुनी

ढाक

.फाल्गुनी

पाकड़ अथवा रुद्राक्ष

हस्त

रीठा

चित्रा

बेल अथवा नारियल

स्वाती

अर्जुन

विशाखा

कटाई अथवा बकुल

अनुराधा

मौलश्री

ज्येष्ठा

चीड़ अथवा देवदार

मूल

साल

पू.षाढ़ा

अशोक

.षाढ़ा

कटहल अथवा फालसा

श्रवण

मदार

घनिष्ठा

शमी

शतभिषा

कदम्ब

पू.भाद्रपद

आम

.भाद्रपद

नीम

रेवती

महुआ

 

इस प्रकार वृक्षारोपण के और भी अनेक विकल्प हो सकते हैं। आवश्यकता केवल विषय के प्रति गंभीर होने की है। यदि किसी भी महानुभाव को गृह-नक्षत्रानुसार वृक्षारोपण के साक्षात दर्शन करने हैं तो वह सीधे शांतिकुंज, हरिद्वार जाकर और भी अधिक जानकारी  लेकर अपनी जिज्ञासा शान्त कर सकते हैं। इस लेख को लिखने की प्रेरणा मुझे वहॉ से ही मिली है।

                                        

 

मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक)

(राजपत्रित अधिकारी) .प्रा.

Website : www.gopalrajuarticles.webs.com;

www.astrotantra4u.com

Mail:  gopalraju12@yahoo.com

 

 

 

 


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