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I am very thankful to Shri Gopal Raju ji because after meeting sir, I felt tremendous change in my life as well as in my studies. Under his guidance I got admission in BVP, Pune. It is my pleasure to meet uncle.
*Vipul Tyagi, Pune
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*Anu Chaurasia
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*Asha Sharma, Meerut
Dr. Gopal Raju Jee is regularly doing anusthan for our family. My son, daughter and husband have getting positive results for the last five years.
*Dr. Manju Singh, Haridwar (UK)
vastu giyan prakash kay liya apka vishash thanks.ap sada pershen rahay. hamara apko ko subh bhav bana rahay, kaya dakshin mukhi face valo ko kuta palna chahiya ya nahi. yadi jankari ho to margdershen davay.
*parveen kumar sharma
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*Daujiram, Delhi
After wearing gemstone combination given by Sh Gopal uncle my temperament has been changed. I was very aggressive before this. I am quite cool now and completing B.Tech will full confidence. His analysis has changed my life. My thnks and regards for him.
*Mayank Saxena, Delhi



पूर्व जन्म में क्या थे हम

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       पूर्व जन्म में क्या थे हम

    कर्मभोग सिद्धान्त की सत्यता को हिन्दुधर्म में विशेष रूप से मान्यता प्राप्त है। संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म मूलतः एक नैतिक सिद्धान्त रहे हैं जिसके अनुरूप व्यक्ति को उसके किए हुए कर्मों का फल मिलता ही मिलता है। यह चाहे एक जन्म में मिले अथवा जन्म-जन्मान्तरों में भटकने के बाद, यह एक अलग और गूढ़ विषय है। जन्म और मरण का विचार भी अटल सत्य है तथा तार्किक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। चिरन्तर से अपनी योग शक्ति, प्रज्ञा बुद्धि और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ऋषि, मुनियों ने सिद्ध कर दिया था कि जीव के अच्छे और बुरे कर्मों के भोग स्वरूप ही जन्म से पूर्व, वर्तमान और भावी जीवन सुनिश्चित होता है।

    भारतीय वाडंमय में तलाशें तो ज्योतिष शास्त्र में भी ऐसे अनेक योग और अरिष्ट मिल जाएंगे जो भूत, वर्तमान और भविष्य का जीवन चित्रित करते हैं।

1. जन्मपत्री में यदि पांच अथवा अधिक ग्रह अपनी उच्च, स्वराशि, शुभ नवांश में स्थित हों तो यह इंगित करता है कि व्यक्ति ने अपना पूर्व जन्म सुखमय रूप से भोगा है। इसके विपरीत ग्रह बलहीन हैं तो निश्चित रूप से अकाल मृत्यु हुई होगी और घोर मानसिक संत्रास में ही व्यक्ति का पूर्व जन्म बीता होगा । कुण्डली में यदि सूर्य त्रिक भावों अर्थात् 6,8 अथवा 12 वें भाव में अथवा तुला राशि में स्थित हो तो व्यक्ति का पिछला जन्म पापमय और भ्रष्टाचार से भरा होता है।

2. लग्न में पूर्ण बली चन्द्र यदि स्थित हो तो यह दर्शाता हैं कि पूर्व जन्म में व्यक्ति ने विवेक   शील जीवन व्यतीत किया होगा और वह वाणिज्य कर्म से जुड़ा होगा।

3. लग्न में, छठे भाव अथवा दसवें भाव में यदि मंगल स्थित है तो यह दर्शाता है कि अपने क्रोधी और दुष्ट स्वभाव स्वरूप उसने अनेकों व्यक्तियों को पीड़ा पहुँचाई होगी।

4. लग्न में अथवा सप्तम भाव में यदि राहु स्थित है तो व्यक्ति की मृत्यु निश्चित रूप से असामान्य कारणों से हुई होगी । राहु की यह स्थिति मूलतः पूर्व जन्म की अकाल मृत्यु दर्शाती है।

5. लग्न, सप्तम अथवा नवम भाव में बलवान गुरु स्थित हो अथवा इन भावों से दृष्टि सम्बन्ध रखता हो तो यह व्यक्ति के पूर्वजन्म के सद्गुणों, विवेकशीलता, धर्मपरायणता आदि को दर्शाता है।

6. जन्म लग्न, एकादश, सप्तम अथवा चतुर्थभाव से यदि शनि सम्बद्व है तो यह दर्शाता है कि जीव का पिछला जन्म नीच कर्मों में लिप्त रहा होगा। कम से कम उसने कुलीन परिवार में जन्म नहीं लिया होगा।

7. जन्म लग्न में यदि बुध स्थित है तो यह दर्शाता है कि वाणिज्य कर्म में जीव लिप्त रहा होगा और सारा जीवन उसका क्लेषों  में बीता होगा।

8. लग्न अथवा नवम भाव में केतु की स्थिति दर्शाती है कि व्यक्ति ने पूर्व जन्म में क्लेष, झगड़ों के बीच जीवन यापन किया होगा। इन सब से निपटने के लिए उसका जीवन तंत्र, मंत्र, अघोर आदि साधनाओें में बीता होगा।

9. लग्न अथवा सप्तम में पूर्ण बली शुक्र की स्थिति दर्शाती है कि उसका पूर्व जन्म पूर्णतया ऐश्वर्यों में बीता होगा।

10. इसी प्रकार व्यक्ति के भावी जीवन के विषय में भी ग्रहों के संयोग से अनेक संकेत मिलते हैं कि व्यक्ति जीवन कैसे भोगेगा।

11. सूर्य और बुध यदि एकादश भाव में हो तो जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

12. पूर्ण बली चन्द्र यदि लग्न में स्थित हो और किसी भी पाप अथवा क्रूर ग्रह द्वारा दृष्ट न हो तो व्यक्ति सद्गती को प्राप्त होता है।

13. मंगल यदि अष्टम भाव से सम्बद्व हो तथा बलहीन शनि से दृष्ट भी हो तो जातक अगले जन्म में नरक स्वरूप कष्ट ही भोगता है।

14. अष्टम भाव में राहु का स्थित होना अगले जन्म के लिए शुभ संकेत है ऐसा व्यक्ति अगले जन्म में सब सुखों का भोग करता है।

15. उच्च का गुरू कुण्डली के किसी भी भाव में स्थित हो, वह कुलीन, सभ्रान्त कुल में भावी जन्म को दर्शाती है।

16. लग्न अथवा नवम भाव में पूर्ण बली चन्द्र और गुरू, चतुर्थ भाव में तुला राशि का शनि, सप्तम भाव में मकर का मंगल वर्तमान जीवन में ही सब प्रकार के सुख भोगता हुआ अंततः ब्रह्म में लीन करवाता है।

17. इस योग के साथ यदि अष्टम और शनिग्रह पूर्ण रूप से निर्दोष हों तो व्यक्ति धर्म-कर्म में आस्थावान होता है तथा सत्कर्मों में अपना जीवन व्यतीत करता हुआ अन्ततः बह्म में लीन हो जाता है।

18. अष्टम भाव में शनि की मकर अथवा कुंभ राशि स्थित होना शुभ संकेत है।  यदि इस पर शनि की भी दृष्टि हो तो व्यक्ति इस जीवन में ही परमपद को प्राप्त होता है।

19. गुरू से दृष्ट अष्टम भाव का शुक्र भी जीवन में परमपद् की प्राप्ति करवाता है। गुरू, शनि, नवम और विशेष रूप से द्वादश भाव में परमपद् की प्राप्ति, जन्म-मरण के कुचक्र से मुक्ति और निर्वाण प्राप्त करवाने  में अहमं भूमिका निभाते हैं।

20. दुष्ट ग्रहों से दृष्ट अथवा युत न होकर बली गुरू अकेला एक ग्रह जीव को जन्म-जन्मान्तरों के भटकाव से मुक्ति दिलवाता है।

21. अष्टम भाव गुरू, शुक्र तथा चन्द्र से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति को परमपद की प्राप्ति होती है।

    प्रस्तुत संक्षिप्त लेख पूर्ण कदापि् नहीं है। यह इस तथ्य का संकेत मात्र है कि पूर्व और भावी जन्मों का चित्रण ग्रह-पूर्णतयः शास्त्र सम्मत है और सम्भव भी। जो लोग ज्योतिष, धर्म, कर्म आदि के समाधान पक्ष पर बल देते हैं उनके लिए इस विषय का विस्तृत ज्ञान विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकता है। पूर्व जन्म में जो कर्म अधूरे रह गए उन से सम्बन्धित प्रायश्चित यदि किए जाएं तो उसका सुफल मिलेगा ही मिलेगा। बौद्विकता भी इसी में है कि पहले समस्याओं के कारण तलाश लिए जाएं तद्नुसार उनके निमित्त गणनाएं करके निदान के उपयुक्त उपाय किए जाएं। कर्म और कर्म भोग सिद्वांतों के ठीक-ठीक अनुरूप और अनुकूल क्रम-उपक्रमों से तुलनात्मक रूप से और भी अधिक प्रभावशाली परिणाम मिलने लगेंगे।

मानसश्री गोपाल राजू

 


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