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*Anu Chaurasia
गोपाल जी ने तीन बार बस्तर में पूजा-अनुष्ठान करवाये हैं । मुझे आज क्या मिला है यह लिखकर नहीं देखकर समझा जा सकता है । जगदलपुर में मै. सजावट का आज का ये रूप उस पूजा-पाठ का ही परिणाम है । उनकी किताब के एक छोटे से प्रयोग ने दिन-ब-दिन हमारे उन्नति के रास्ते खोल दिए थे । उस चमत्कारी प्रभाव से प्रेरित होकर ही मैं उनसे मिला था । गोपाल जी का व्यक्तित्व मैग्नेटिक प्रभाव वाला है और उनके क्रम, उपक्रम, लेखन आदि सब विलक्षण हैं और सबसे अलग ।
*सत्यपाल मग्गू, जगदलपुर, बस्तर
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*Ashwarya Dobhal, Delhi
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*Tejpal Singh, Muzaffernagar
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*Anu Chaurasia, Delhi
श्री राजू जी ने मुझको १९८३ में पुखराज और मूंगे की एक रिंग दी थी । उससे मुझको आशा से भी अधिक लाभ मिल रहा है । रत्न गणना की उनकी अपनी विधियां वास्तव में प्रशंसा के योग्य हैं ।
*अनिल कुमार त्यागी, जे. ई., पौड़ी



चाणक्य सूत्र - कौटिल्य गृहवास्तुकम

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मानसश्री गोपाल राजू (वैज्ञानिक)

 

चाणक्य सूत्र - कौटिल्य गृहवास्तुकम

कौटिल्य के अर्थशास्त्र और चाणक्य सूत्र महाग्रंथ के वास्तु के गृहवास्तुकम प्रकरण 64 में ग्रह निर्माण के विषय में आवश्यक विवरण दिए गए हैं। वास्तुविषयक जिज्ञासुओं के लाभार्थ उसका सार-संक्षेप यहॉ प्रस्तुत किया जा रहा है।

इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि उस काल में भी वास्तु विज्ञान कितना प्रचलित था और राज्य की ओर से वास्तु नियमों के पालन पर विशेष रुप से कितना अधिक बल दिया जाता था।

1. गॉव के मुखियाओं (सामंतों) को चाहिए कि वे वास्तुविषयक झगड़ों का फैसला करें।

2. घर, खेत, बाग-बगीचे, सीमाबंध, तालाब और बाग-बगीचे आदि सब वास्तु कहलाते हैं।

3. प्रत्येक घर के चारों ओर चार कोनों पर लोहे के छोटे खंभे गाड़ कर उनमें जो तार खींच दिया जाता है, उसी का नाम सेतु (सीमा) है। सीमा के अनुसार ही घर बनवाना चाहिए।

4. दूसरे की दीवार के सहारे मकान न बनवाया जाए। मकान की नींव में सवा फुट या 3 पद कंकड़ी-पत्थर भरवाने चाहिए।

5. दस दिन के लिए बनाए जाने वाले सूतिका ग्रह को छोड़कर, बाकी सब मकानों में पाखाना, पाईप, कुंआ, पाकशाला और भोजनशाला अवश्य बनवाने चाहिए। इस नियम का उल्लंघन करने वाले को पूर्व साहस दण्ड दिया जाना चाहिए।

6. उत्सवों के समय कुल्ले का पानी बाहर निकालने के लिए नालियों और भटिटयों का प्रबन्ध भी हर मकान में रहना चाहिए।

7. प्रत्येक मकान पर सवा फुट (तीन पद) का गहरा, प्लेन तथा साफ-सुथरा पतनाला पानी के बहने के लिए दीवार के साथ-साथ अथवा दीवार से अलग बनवाया जाए। इस नियम का उल्लंघन करने वाले पर पचास पण का दण्ड किया जाए।

8. घर के बाहर एक चार खम्बों से सज्जित एक यज्ञशाला बनवाई जाए, जिसमें एक पद गहरा पानी बाहर निकलने की नाली हो। यज्ञशाला की दूसरी ओर आटा पीसने की चक्की और अनाज भरने के लिए ओखली बनवाई जाए। ऐसा प्रबन्ध न करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाए।

9. सधारणतया दो मकानों के बीच में एक हाथ का फासला होना चाहिए। छज्जे वाले या उसारे वाले मकानों में भी इतना फासला अवश्य रहना चाहिए। प्रत्येक दो मकानों की छतों में चार अंगुल का अन्तर हो या वे आपस में मिली भी रहें। गली की ओर एक हाथ नाप की खिड़की बनाई जाए, जो मजबूत हो और जिसको यथावसर खोला जा सके। रोशनी आने के लिए खिड़की में ऊपर छोटे-छोटे रोशनदान बनवाए जाएं। अन्तिम मकान के रोशनदान पर छाया के लिए टिन आदि लगवा देना चाहिए अथवा पास-पड़ौस के रहने वाले आपसी समझौते से अपनी इच्छानुसार मकान बनवा लें, जिससे एक दूसरे को कष्ट न हो।

10 वर्षा ऋतु के लिए स्थाई रुप से घास-फूस की एक छत बनवा लेनी चाहिए। ऐसा न करने पर पूर्व साहस का दण्ड दिया जाए।

11 जो व्यक्ति बाहर की ओर दरवाजा या खिड़की बनवाकर पड़ौसियों को कष्ट दे उसको भी पूर्व साहस दण्ड दिया जाए। यदि वे दरवाजे या खिड़कियों शाही सड़क या बाजार की ओर खुलें तो कोई हर्ज नहीं है।

12 गड्डा, जीना, सीढ़ी और पाखाना आदि के द्वारा जो मकान मालिक अपने पड़ौसियों को कष्ट पहॅुचाए, सहन को रोके और पानी निकालने का ठीक प्रबन्ध न करे तो वह भी पूर्व साहस दण्ड का भागीदार है।

13 पानी आदि से जो दूसरे की दीवाल को नुकसान पहॅुचाए उसे बारह पण दण्ड दिया जाए। पेशाब और पाखाने की की रुकावट करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाए।

14 कूड़ा-करकट बहने के लिए वर्षा ऋतु में हरेक नाली खुली रहनी चाहिए। अन्यथा उसको बारह पण दण्ड दिया जाए।

15 धर्मशाला आदि पंचायती घरों में सहायता न देने वाले व्यक्ति को तथा उन घरों का उपयोग करने में बाधा डालने वाले व्यक्ति को बारह पण दण्ड दिया जाए। यदि कोई उन घरों को क्षति पहुंचाए तो उनपर चौबीस पण जुर्माना किया जाए।

16 कोठा और आंगन को छोड़कर अग्निशाला, ओखली तथा दूसरे सभी खुले स्थानों का सब उपयोग कर सकते हैं।

   इसी प्रकार से इस महाग्रंथ में मकान बेचना, सीमा विवाद, खेतों की सीमाएं, मिक्षित विवाद,

रास्तों को रोकना, गॉवों का बन्दोबस्त, चरागाहों का प्रबन्ध तथा सामूहिक कार्यों में हिस्सा न लेने के फलस्वरुप दण्ड आदि के अनेकानेक नियम वर्णित किए गए हैं। यह सब प्रकरण इस बात के प्रतीक है कि वास्तु नियम लागू करवाने में तात्कालिक प्रशासन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

 

 

 

 

 


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